Thursday, May 26, 2011

Go Mahima by Brahmchari Anantbodh Chaitanya










धर्मं की जय हो  ॥ अधर्म का नाश हो प्राणियों में सदभावाना हो ॥ विश्व का कल्याण हो ॥  हर हर महादेव 
गौ हत्या बन्द हो ॥ गौ माता की जय हो ॥ भारत माता की जय हो ॥
गोरुत्पत्ति - दक्षप्रजापति के अमृतपान से तृप्त होने पर जीवों के कल्याणार्थ उनकी क्षुत् तृषा निवृत्ति के लिये मुख से असंख्य कपिला गायें उत्पन्न हुई| ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार गोलोक निवासी बालकृष्ण के मन में गोदुग्ध पीकर गोपाल होने का भाव आया।गाय द्वारा जो पालित है।[गावः पालयन्ति यं इति गोपालः]-अथवा गायों का जो पालन करता है। [गां पालयति यः स इति गोपालः]।तो उनके दक्षिण में सुरभि का प्राकट्य हो गया भगवान कृष्ण ने पर्याप्त दूध दुहकर पी लिया शेष जो दूध बचा वही गोलोक का क्षीरसागर बना।
सिद्धान्तशिरोमणी के अनुसार देवाधिदेव महादेव को अपने पांचों मुखों पर पांच प्रकार की भस्म लगाने का भाव आया तब उनके पञ्चवक्त्रों से पांच गावों का तथा पांच गावों से ही पांच प्रकार की विभूति का उदय हुआ जो इस प्रकार है
१ सद्योजात - नन्दा - विभूति
२ वामदेव - भद्रा - भसित
३ अघोर - सुरभि - भस्म
४ तत्पुरुष - सुशीला - क्षार
५ ईशान -सुमना - रक्षा
नन्दा भद्रा च सुरभीः सुशीला सुमनास्तथा ।
पञ्चगावो विभोर्जाताः सद्योजातादि वक्‌त्रतः॥
विराट पुरुष से गौ उत्पन्न हुई {गावो ह जज्ञिरे } पुरुषसूक्त यजूर्वे
गोपदार्थ -गौ - पृथ्वी -स्वर्ण -सुर्यकिरणें- इन्द्रियां -वेदवाणी -आदि विभिन्न अर्थ संस्कृत साहित्य में प्राप्त हैं। गच्छति इति गौ गमेर्ड इस धातु से गौ शब्द की निष्पति होती है। अर्थात् जो चल रही है जा रही है तात्पर्य जो कुछ भी दुनियां मे चल रहा है जा रहा है सब कुछ गौ ही है संपूर्ण प्रपञ्च गौ ही है।विश्व की लगभग सभी भाषा ओं मेंगाय को कू कौ का ऊ बोला जाता है। अंग्रेजी में तो परमात्मा तक को गोद कहा जाता है जो स्पैलिङ्ग गौड की होगी वही गोद की होगी अर्थात् गां ददाति इति गोद -जिसने विश्व कल्याणार्थ गौ दी या दान की वही गौ दाता भगवान ही अंग्रेजी का गौड हो गया।गोमति गोमती और गोदावरी नदियों का जीवन तो गौ ही है।गोरक्षपुर गोरखपुर गोरक्षक गोरखाजाति मारवाडियों में एक गौत्र विशेष गो इनका गोयनका गोल्याण हिंसकों से जो गायों को बचाकर लाये।
संस्कृतभाषा में एक गवेषणा शब्द है इसका अर्थ है -गो की इच्छा ।जैसे वित्तेषणा पुत्रेष्णा ठीक वैसे ही गवेष्णा भी ग्राह्य है।गौ हमारी जीवन धायक शक्ति हमारी रग रग में बसी रोम रोम में रमी है।गौ धूलि वेला का मुहूर्त अत्युत्तम है।
गौ पद से जैसी कैसी जर्सी विदेशी दोगली वर्णसाङ्कर्योत्पन्न गौ वाच्य नहीं है।इसकी उपेक्षा तो व्यक्ति भैंस पाल ले तो ठीक हैब्रह्मचारी अनन्तबोध चैतन्य ,हरिद्वार

2 comments:

jugal kishore said...

very nice i agree your statement

Anonymous said...

धर्म- सत्य, न्याय एवं नीति को धारण करके उत्तम कर्म करना व्यक्तिगत धर्म है । धर्म के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । धर्म पालन में धैर्य, विवेक, क्षमा जैसे गुण आवश्यक है ।
शिव, विष्णु, जगदम्बा के अवतार एवं स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है । लोकतंत्र में न्यायपालिका भी धर्म के लिए कर्म करती है ।
धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस परिस्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
अधर्म- असत्य, अन्याय एवं अनीति को धारण करके, कर्म करना अधर्म है । अधर्म के लिए कर्म करना भी अधर्म है ।
कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म (किसी में सत्य प्रबल एवं किसी में न्याय प्रबल) -
राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मंत्रीधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
जीवन सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक एवं परमात्मा शिव की इच्छा तक रहेगा ।
धर्म एवं मोक्ष (ईश्वर के किसी रूप की उपासना, दान, तप, भक्ति, यज्ञ) एक दूसरे पर आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है ।
धार्मिक ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है । by- kpopsbjri

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